google.com, pub-1480548673532614, DIRECT, f08c47fec0942fa0 google.com, pub-1480548673532614, DIRECT, f08c47fec0942fa0 Kabu Education : Essay
Essay लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
Essay लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

​​केंद्रीय उत्पाद शुल्क दिवस (Central Excise Day)


 ​​केंद्रीय उत्पाद शुल्क दिवस 

(Central Excise Day)



प्रत्येक वर्ष 24 फरवरी को केंद्रीय उत्पाद और सीमा शुल्क बोर्ड (CBCE) द्वारा पूरे देश में केंद्रीय उत्पाद शुल्क दिवस मनाता है। 


उद्देश्य : -

केंद्रीय उत्पाद और कस्टम बोर्ड ऑफ इंडिया का अर्थव्यवस्था में योगदान तथा केंद्र सरकार की इस प्राथमिक कर संग्रह एजेंसी के अधिकारियों द्वारा की गई कड़ी मेहनत को सम्मानित करना। इसके अतिरिक्त ‘माल निर्माण व्यवसाय’ में भ्रष्टाचार की जाँच करने व देशवासियों को केंद्रीय उत्पाद और सीमा शुल्क बोर्ड के महत्व को बताना भी है।


कैसे मनाया जाता है :-

•विभिन्न सेमिनार, कार्यशालाएं, शैक्षिक और सांस्कृतिक कार्यक्रमों के अतिरिक्त केंद्रीय उत्पाद और सीमा शुल्क बोर्ड देश भर में इस दिन आम जनता को विभाग के अधिकारियों की भूमिकाओं और जिम्मेदारियों को समझने हेतु जागरूकता कार्यक्रमों की एक शृंखला भी आयोजित करता है।


पृष्ठभूमि :-

केन्द्रीय उत्पाद शुल्क विभाग वर्ष 1855 में अंग्रेजों द्वारा स्थापित भारत के सबसे पुराने विभाग में से एक है। 

•आज ही के दिन वर्ष 1944 में केन्द्रीय उत्पाद शुल्क तथा नमक कानून बनाया गया था। 

•वर्ष 1996  से पहले केंद्रीय उत्पाद शुल्क अधिनियम, 1944, केन्द्रीय उत्पाद शुल्क व नमक अधिनियम, 1944 के नाम से जाना जाता था।

•भारत में यह विभाग केंद्रीय अप्रत्यक्ष कर और सीमा शुल्क (CBIC), माल, और सेवा कर (GST), केंद्रीय उत्पाद शुल्क, और नारकोटिक्स के संचालन के लिए जिम्मेदार है। 

•केंद्रीय उत्पाद और सीमा शुल्क बोर्ड (सीबीईसी) केंद्रीय वित्त मंत्रालय के अधीन राजस्व विभाग का एक हिस्सा है।

•इस बोर्ड के अपने अधीनस्थ संगठनों हेतु प्रशासनिक प्राधिकरण है जिसमें कस्टम हाउस, केंद्रीय उत्पाद शुल्क और सेवा कर आयुक्त और केंद्रीय राजस्व नियंत्रण प्रयोगशाला शामिल हैं। 

•सेंट्रल एक्साइज डिपार्टमेंट को सरकारी ऐजेंसियों बीएसएफ, ईडी, एनसीबी, इनकम टैक्स, आईटीबीपी, के मुकाबले सबसे ज्यादा सर्वश्रेष्ठ एंटी स्मगलिंग ऐजेंसी का अवॉर्ड मिल चुका है। 

•वर्ष 1979 में सेंट्रल एक्साइज की इंटैलीजेंस एजेंसी (डीजीसीईआई) की स्थापना हुई थी। जो कि साल 2000 तक ऐजेंसी डाईरेक्टोरेट जनरल ऑफ एटीविजन के नाम से जानी जाती थी।

क्या स्विस बैंकों में सिर्फ काला धन ही जमा होता है?(Is only black money deposited in Swiss banks?)

 

क्या स्विस बैंकों में सिर्फ काला धन ही जमा होता है?

(Is only black money deposited in Swiss banks?)




कहते है स्विट्ज़रलैंड की घड़ियां, चॉकलेट और वहाँ की ऐल्प्स पर्वत श्रेणियां विश्व में बहुत प्रसिद्ध हैं। लेकिन वहाँ का बैंकिंग सिस्टम भी पिछली तीन शताब्दियों से चर्चा में रहा है।


स्विट्ज़रलैंड में दो प्रमुख बैंक है। पहला यूनियन बैंक ऑफ स्विट्ज़रलैंड एवं दूसरा क्रेडिट सुइस्से बैंक इसके अलावा वहाँ 400 अन्य छोटे बड़े बैंक हैं। दो प्रमुख बैंकों में दुनियां भर के जमा पैसे का 50% पैसा जमा होता है बाकी 50% अन्य 400 बैंकों में जमा होता है।


इस बात में कोई शक नहीं है कि पैसा सुरक्षित रखने के मामले में स्विस बैंकों की प्रतिष्ठा सबसे ऊपर है। प्रथम और द्वितीय विश्वयुद्धों में जब सरकारें युद्ध का खर्चा निकालने के लिए लोगों की कमाई पर भारी टैक्स लगाने लगी तब यूरोपीयन देशों के लोगों ने अपना पैसा स्विस बैंकों में डालना शुरू किया। युद्ध के उस दौर में बड़े बड़े यहूदी व्यापारी भी अपना पैसा इन बैंकों में जमा कराते थे तो स्वयं हिटलर ने भी अपना खाता इन बैंकों में खोल रखा था।यूरोप के कई देशों के लोग अपना पैसा वहाँ पर जमा करते थे।



▪️क्यों सबसे सुरक्षित है स्विस बैंक?

परंपरागत रूप से लगभग दो शताब्दियों से स्विस बैंक गोपनीयता बरत रहे हैं। लेकिन 1934 में एक फ़ेडरल एक्ट बनाकर उन्होंने प्राइवेसी को और अधिक मजबूत कर दिया। किसी की बैंकिंग संबंधी प्राइवेसी को भंग करने पर वहाँ कर्मचारियों को 5 साल की जेल हो सकती है। आश्चर्य की बात है कि लगभग 100 सालों में प्राइवेसी भंग करने के सिर्फ चार मामले सामने आए हैं।


स्विस बैंक में खाता केवल डिजिटल नंबर से खोला जाता है जिससे खाताधारक के नाम की जानकारी खुद कर्मचारियों को भी नहीं होती। इनके लाकर्स ऐल्प्स की पहाड़ियों की अनजान गुफाओं तथा मजबूत बने बंकरों में भी होते हैं। पैसा भी पूरी तरह से बीमित होता है। हालांकि जमा पैसे पर ब्याज देने के बजाय ब्याज लिया जाता है लेकिन पैसा जमा कराने के बाद जमाकर्ता चेन की नींद सो सकता है। स्विस सरकार कोई विरले अंतरराष्ट्रीय मामलों में ही कोई खाताधारक की जानकारी देती हैं। बैंक तो लगभग मौन ही रहते है। स्विस मुद्रा की इन्फ्लेशन रेट जीरो होने के साथ वहां की अर्थव्यवस्था बहुत अच्छे से स्थापित है इस कारण भी लोग वहाँ के बैंकों पर विश्वास करते हैं। 2018 में स्विस सरकार एक पैक्ट के तहत 73 देशों के साथ खाताधारकों की कुछ जानकारियां शेयर करती है जिसमें भारत देश भी शामिल है हालांकि वह भी बहुत मुश्किल से।



▪️️कितना पैसा जमा है भारतीयों का?

वर्ष 2006 में भारतीयों का 52575 करोड़ रुपया स्विस बैंकों में जमा था। आगे के वर्षों के यह रकम काफी कम हो गयी लेकिन अभी हाल ही में जारी स्विस बैंक की आधिकारिक घोषणा में यह रकम पिछले कुछ वर्षों के मुकाबले बढ़कर 20700 करोड़ हुई है हालांकि उसमें ग्राहक जमा में 6% कमी आई है। प्राइवेसी के कड़े नियमों के चलते यह कहना बहुत मुश्किल है कि इसमें काला धन कितना है।


स्विस बैंकों में जमा धन के मामले में ब्रिटेन 30.49 लाख करोड़ रुपयों एवं अमेरिका 12.29 लाख करोड़ रुपयों के साथ क्रमशः प्रथम एवं द्वितीय स्थान पर है।


अपने धन की निष्पक्षता रखने की साख के चलते स्विट्ज़रलैंड यूरोपीयन यूनियन का सदस्य नहीं बना तथा संयुक्त राष्ट्र संघ का भी सदस्य बहुत बाद में 2002 में बना।


कहते है स्विस नागरिक गोली खा लेगा लेकिन अपने ग्राहकों की जानकारी नहीं देगा।


क्या अंतरिक्ष स्टेशन अब प्रतिष्ठा की लड़ाई है?(Is the space station a prestige battle now?)

 क्या अंतरिक्ष स्टेशन अब प्रतिष्ठा की लड़ाई है?

(Is the space station a prestige battle now?)



▪️क्या होता है अंतरिक्ष स्टेशन?

यह एक बड़ा सा अन्तरिक्ष यान होता है। जिसका आकार एक छोटे घर से लेकर फुटबॉल के मैदान जितना हो सकता है। सामान्यतया ये धरती से 250 मील या 400 किलोमीटर ऊपर स्थापित होते हैं। यह वह दूरी होती है जहाँ गुरुत्वबल की रस्साकस्सी सन्तुलित हो जाती है।  लेकिन वहाँ पर ये स्टेशन धरती के चारों ओर 17500 मील प्रतिघंटा की रफ्तार से धरती का चक्कर लगाते रहते है। 90 मिनट में धरती का एक चक्कर लगा लेते है। इस तरह से दिन में औसतन 15 चक्कर लगा लेते है।



▪️कैसा होता है बाहर और अंदर से अंतरिक्ष स्टेशन?

अभी अंतरिक्ष में 2 ही स्टेशन स्थापित है। 

पहला 1998 में रूस और अमेरिका की नासा एजेंसी द्वारा जापान, फ्रांस, कनाडा आदि देशों के सहयोग से इंटरनेशनल स्पेस स्टेशन में भेजा गया। वर्ष 2000 से वहाँ लगातार इंसान रह रहे हैं।


दूसरा चीन द्वारा अभी 2021 में भेजा गया तिअंगोंग-2 स्टेशन है।


नासा द्वारा भेजा गया अंतरिक्ष स्टेशन एक फुटबॉल के मैदान जितना बड़ा है तथा करीब 4 लाख किलो वजनी है। उसमें 6 कमरे, दो बाथरूम, जिम्नेजियम और कई प्रयोगशालाएं हैं। बाहर सौर ऊर्जा ग्रहण करने के लिए उसके विशाल पंख फैले हुए हैं। कभी कभी अंतरिक्ष यात्री बाहर निकलकर हवा में तैरते हुए स्पेसवॉक भी करते हैं।


चीन द्वारा स्थापित अंतरिक्ष स्टेशन एक लाख किलो वजनी है तथा कम लोगों के रुकने की जगह है।



▪️अब तक कितने लोग अंतरिक्ष स्टेशन पर जा चुके हैं?

वर्ष 2021 तक 19 देशों से 241 लोग अंतरिक्ष स्टेशन पर जा चुके हैं। वर्ष 1984 में भारत से राकेश शर्मा भारत की तरफ से पहले अंतरिक्ष यात्री थे। भारतीय मूल की अमेरिकी अंतरिक्ष यात्री कल्पना चावला ने भी यह किया लेकिन अंतरिक्ष से लौटते समय यान दुर्घटनाग्रस्त होने से उनकी मृत्यु हो गयी।



▪️सेटेलाइट अंतरिक्ष स्टेशन से किस प्रकार भिन्न हैं?

1957 में रूस ने अपना पहला सेटेलाइट स्पूतनिक-1 अंतरिक्ष में भेजा था जो धातु से बना हुआ मात्र 23 इंच के आकार का था। उसके बाद तो दुनियांभर के देशों में सेटेलाइट भेजने की होड़ मच गयी। कई ग्रह उपग्रहों के इर्दगिर्द हजारों की संख्या में छोटे-बड़े सैटेलाइट उनके ऑर्बिट में घूम रहे हैं। उनकी संख्या का अनुमान लगाना बहुत मुश्किल है। 


भारी शक्ति के टेलिस्कोप से दोनों को इंसान देख सकता है।



▪️क्या कार्य करते है स्पेस स्टेशन एवं सैटेलाइट ?

स्पेस स्टेशन की लैबों में अब तक 2800 महत्वपूर्ण प्रयोग हो चुके है तथा नित नए प्रयोग होते रहते हैं। वहाँ अंतरिक्ष एवं भविष्य की अंतरिक्ष योजनाओं का बारीक अध्ययन किया जाता है


जबकि सैटेलाइट मौसम का मिजाज तथा छोटी-बड़ी भूगर्भीय हलचलों को बताते है और इससे मिली जुली जानकारी देते हैं।



▪️अब भारत को क्या करना होगा?

चीन द्वारा अंतरिक्ष में स्टेशन स्थापित कर देने के बाद भारत को भी जल्दी ही इस दिशा में आगे बढ़ना होगा। दुनियां में शक्ति का प्रदर्शन भी अब प्रतीकात्मक हो गया है। भारत के आकार और  जनसंख्या के लिहाज से यह अपेक्षा हर कोई करेगा।


क्या व्लादीमिर पुतिन का जलवा 2036 तक कायम रहेगा?


 क्या व्लादीमिर पुतिन का जलवा 2036 तक कायम रहेगा?



वर्ष 1922 से पहले तक रूस राजतन्त्र की शासन प्रणाली में चलता रहा। 1922 से 1991 तक सोवियत यूनियन कई छोटे बड़े देशों का संघ था। केवल साम्यवादी पार्टी सत्ता में प्रमुख थी। केन्द्रीय शासन व्यवस्था थी। लेकिन 1991 तक सोवियत यूनियन के 15 टुकड़े हो गए।


रूस उनमें सबसे बड़ा भाग रहा। उस कठिन दौर में रूस की जनता ने बोरिस येल्तसिन को अपना  राष्ट्रपति लगातार 2 टर्म (1991-1999 तक) तक चुना। लेकिन इन 8 सालों में वे रूस को प्रगति के पथ पर नहीं ला पाये और जनता में असंतोष बढ़ता गया। बोरिस येल्तसिन ने भारी मन से 1999 में अपना इस्तीफा सौंप दिया।


उस वक्त येल्तसिन के अधीन प्रधानमंत्री व्लादिमीर पुतिन हुआ करते थे। संवैधानिक नियमों के अनुसार राष्ट्रपति के इस्तीफा देते ही पुतिन 1999 में कार्यवाहक राष्ट्रपति बन गए।


पुतिन का जन्म 7 ऑक्टोम्बर 1952 को हुआ था। प्रधानमंत्री एवं राष्ट्रपति बनने से पहले वे तत्कालीन सोवियत संघ की इंटेलिजेंस एजेंसी केजीबी में कई वर्षों तक जासूस या इंटेलिजेंस ऑफिसर रहे।


रूस की जनता ने पुतिन में अपार संभावनाएं दिखी। जनता ने अपने पॉपुलर वोट सिस्टम से 1999 से लेकर 2008 तक लगातार 2 टर्म तक उनको राष्ट्रपति बनाया।


बचपन से ही जुडो जैसी मार्शल आर्ट में पारंगत पुतिन अपनी एंग्री यंगमैन की छवि के लिए जाने जाते थे। 2015 में उन्होंने एक जगह कहा था कि अगर झगड़ा तय है तो पहला पंच आप मारो। अपनी उग्र और स्मार्ट कार्यशैली के चलते वे रूस में बहुत तेजी से आर्थिक बदलाव लाए और रूस के मध्यम वर्ग को आर्थिक रूप से बहुत सशक्त बना दिया। यद्यपि अमीर वर्ग को सहारा देने के आरोप भी उनपर लगते रहे।


राजनीतिक उठापठक के चलते 2008 से 12 तक 1 टर्म के लिए जनता का पॉपुलर वोट दमिट्री मेदवेदेव के पक्ष में गया और वे राष्ट्रपति बन गए और पुतिन को एक ओहदा नीचे प्रधानमंत्री बनना पड़ा। लेकिन अपने प्रभावी व्यक्तित्व एवं अधिकारियों के साथ देशव्यापी सम्पर्क के चलते वे प्रधानमंत्री होते हुए भी राष्ट्रपति की अधिकतर शक्तियों का निर्वाहन कर रहे थे।


2012 में जनता ने फिर से पुतिन में विश्वास जताया और वे तीसरे और चौथे टर्म में अब तक लगातार राष्ट्रपति बने हुए है। टर्म भी चार साल से छः साल कर दिया गया।


सरल भाषा में समझें तो रूस में 1991 से अबतक 7 बार राष्ट्रपति के चुनाव हुए है उसमें पुतिन 4 बार भारी मतों से जीते है। अगला चुनाव 2024 में होना है तथा एक सर्वे के अनुसार रूस की 48% जनसंख्या आज भी पुतिन के पक्ष में है। कुछ विवादास्पद संवैधानिक संशोधन उनके काल में हुए है या करवाये गए है जिसमें एक राष्ट्रपति लगातार दो से अधिक बार राष्ट्रपति बन सकता है।


कभी आइस हॉकी खेलते हुए कभी पावर बाइक पर सवार होकर, कभी घोड़े पर सवार होकर, कभी युद्धक विमान में सवारी करके वे अपनी माचोमैन वाली छवि को दुनियां को दिखाते रहते है। दुनियां के कई हिस्सों में अभी भी अपनी दबंगई दिखाते हुए उन्होंने यूएसए के खिलाफ दुनियां में पावर संतुलन स्थापित करने का खेल खेला है और कई जगह सफल भी रहे है।


क्या लगता है आपको 2024 या आगे भी पुतिन अपना जलवा कायम रख पायेंगे?



"स्विट्ज़रलैंड: जहाँ सात राष्ट्रपति मिलजुलकर देश चलाते है"


 "स्विट्ज़रलैंड: जहाँ सात राष्ट्रपति मिलजुलकर देश चलाते है"



स्विट्जरलैंड को दुनिया के सबसे खूबसूरत जगहों में से एक माना जाता है। यहां 1,500 से ज्यादा झीलें हैं और कोई भी झील देश की सीमा के अंदर दूसरी झील से 16 किमी. से ज्यादा दूर नही है। इस देश का करीब 70 फीसदी हिस्सा पहाड़ों से ढंका हुआ है। दुनियां का सबसे व्यवस्थित बैंकिंग सेक्टर यहीं का है।


स्विट्ज़रलैंड में भी ज्यादातर देशों की तरह द्विसदनीय शासन व्यवस्था है। देश में कुल 26 प्रान्त है। वहाँ 200 सीट वाले प्रथम सदन को राष्ट्रीय कौंसिल कहा जाता है तथा 46 सीट वाले द्वितीय सदन को कौंसिल ऑफ स्टेट कहा जाता है। दोनों सदनों को मिलाकर संघीय सभा कहा जाता है।


देश की संघीय सभा एक संघीय परिषद (फेडरल कौंसिल) को चुनती है जिसमें 7 सदस्य होते हैं। एक तरह से ये सातों सदस्य देश के सबसे शक्तिशाली व्यक्ति होते है। पूरी कौंसिल को ही हेड ऑफ द स्टेट कहा जाता है। लेकिन उसी कौंसिल में से एक सदस्य को 1 वर्ष के लिए देश का राष्ट्रपति बनाया जाता है लेकिन उसके पास अलग से कोई पावर नहीं होता है। एक वर्ष बाद 7 सदस्यों में से अन्य को क्रमशः मौका मिलता है। वर्तमान में गाए परमेलिन 1 जनवरी 2021 से राष्ट्रपति के रूप में सत्ता में है। वैसे तो स्विस राष्ट्रपति अपने कार्यकाल में विदेश यात्राओं पर जाते ही नहीं है लेकिन कभी जाते भी है तो अपने डिपार्टमेंट के हेड की हैसियत से ना कि राष्ट्रपति की हैसियत से। बाहरी राजनयिक का स्वागत करना हो तो सातों एक साथ एयरपोर्ट पर उपस्थित होते हैं। सभी निर्णय भी सब मिलकर लेते हैं।


देश में 8 वां सबसे मजबूत पद चांसलर ऑफ स्विट्ज़रलैंड का होता है। वर्तमान में यह पद 1 जनवरी 2021 से वाल्टर थर्नहर के पास है। उनका काम संघीय सभा और संघीय परिषद के बीच में सामंजस्य बिठाना तथा बिना वोट दिए संघीय परिषद की महत्वपूर्ण सभाओं में उपस्थित रहना होता है।


कहते है कि "साझेदारी की हंडिया चौराहे पर जाकर फूट जाती है" लेकिन स्विट्ज़रलैंड में तो यह खूबसूरत व्यवस्था एक शताब्दी से भी अधिक समय से चल रही है।


आपको भी शायद यह व्यवस्था अच्छी लगी होगी।

मानव जीवन में शिक्षा का महत्त्व(Importance of education in human life)


मानव जीवन में शिक्षा का महत्त्व

(Importance of education in human life)



✔️ 21 वीं सदी में वैश्विक अर्थव्यवस्था की कमान उन्ही के हाथों में होगी जो अपने बच्चों को बेहतर शिक्षा देगे। नेल्सन मंडेला ने एक बार कहा था, शिक्षा सबसे शक्तिशाली हथियार है जिसका उपयोग आप दुनिया को बदलने के लिए कर सकते हैं'। 


✔️ शिक्षा अपने चारों ओर की चीजों को सीखने की एक प्रक्रिया है। यह हमें किसी भी वस्तु या परिस्थिति को आसानी से समझने, किसी भी तरह की समस्या से निपटने और पूरे जीवन भर विभिन्न आयामों में सन्तुलन बनाए रखने में हमारी सहायता करती है। शिक्षा से मनुष्य केवल ज्ञान और रोजगार तक सीमित नहीं हो सकता है, शिक्षा स्वतंत्रता को जन्म देती है। 



✔️ जॉर्ज वाशिंगटन के विचारो में 'शिक्षा स्वतंत्रता के सुनहरे दरवाजों को खोलने की कुंजी है' हम अपने हक के बारे में जानते हैं, शिक्षा से एक सभ्य समाज का निर्माण है। शिक्षा के बिना मनुष्य पशु के समान है। इस लिए शिक्षा सभी मनुष्यों का सबसे पहला और सबसे आवश्यक अधिकार है। बिना शिक्षा के हम अधूरे हैं, और हमारा जीवन बेकार है। शिक्षा हमें अपने जीवन में एक लक्ष्य निर्धारित करने और आगे बढ़ने के लिए प्रेरित करती है। यह हमारे ज्ञान, कुशलता, आत्मविश्वास और व्यक्तित्व में सुधार करती है। यह हमारे जीवन में दूसरों से बात करने की बौद्धिक क्षमता को बढ़ाती है। शिक्षा परिपक्वता लाती है और समाज के बदलते परिवेश में रहना सिखाती है। यह सामाजिक विकास, आर्थिक वृद्धि और तकनीकी उन्नति का रास्ता है। 



✔️ आज बदलते दौर में शिक्षा की उपयोगिता पर ध्यान देना चाहिए। शिक्षा के आभाव में मनुष्य आज्ञानी हो जाता है, इसका उदाहरण वैश्विक महामारी कोरोना में देखने को कही अधिक मिला है। समाज में व्याप्त कुरीतियों, अंधविश्वास, पाखंड शिक्षा के आभाव का परिलाक्षित होता है। और इसका सीधा असर व्यक्ति के सेहत से जुड़ जाता है, अक्सर देखने को मिलता है कि अंधविश्वास के चलते मनुष्य मानसिक तनाव से ग्रस्त हो जाता है। कभी कभी तो जान तक गवाना पड़ जाता है। ये मामले अधिकतर उन हिस्से में देखने को मिलता है जहाँ शिक्षा का आभाव होता है। 



✔️ आज जिस तरह से वैश्विक परिदृश्य में बदलाव हो रहे हैं, तमाम तरह के समस्या जैसे घरेल हिंसा, निर्धनता, सामाजिक दुर्व्यहार, न्याय से वंचित समाज, जिसकी खामियाजा भुगतना उन लोगो को पड़ता है जो आज्ञानी है और दूसरों पर निर्भर होते हैं। आज जिस तेजी से बढ़ रही जनसंख्या वृद्धि, लैंगिक भेदभाव, ये एक चिंता का विषय है। 



✔️ हम अपने देश की बात करे तो संयुक्त राष्ट्र की “विश्व जनसंख्या प्रोस्पेक्टर्स 2019 रिपोर्ट“ के अनुसार 2050 तक भारत की जनसंख्या में 273 मिलियन का इजाफा हो जाएगा जो विश्व की सबसे अधिक जनसंख्या वृद्धि होगी। 



✔️ भारत अभी भी उन देशों में जहां कार्यशील जनसंख्या सर्वाधिक तेजी से बढ़ रही है। जो आर्थिक संवृद्धि के अवसरों को तीव्र करता है। 2047 तक भारत की जनसंख्या वृद्धि संवृद्धि अपने चरम पर होगी। ऐसे में बदलते नये भारत के लिए निशिचित ही जरूरी है, की हम अपने शिक्षा व्यवस्था में वैश्विक मानकों के अनुसार जरूरी परिवर्तन करे। 



✔️ जिसके समग्र विकास के लिए भारत के युवा को एक खास शिक्षा की जरूरत पड़ेगी और भारत को उस पे निवेश करना होगा। तभी एक बेहत भविष्य का निमार्ण होगा। भारत को अपने सबसे महत्वपूर्ण पूंजी अपने नागरिकों की शिक्षा गुणवत्ता पर गंभीर रूप से ध्यान देने की जरूरत है।

क्या सबके हाथ में है तकनीक की तिजोरी?


क्या सबके हाथ में है तकनीक की तिजोरी?



जानिए आज विशेष:-

✔️ लाकडाउन के साथ ही सुयश की पढ़ाई छूट गई, न स्मार्ट फोन न इंटरनेट।  दिल्ली की दमघोंट सुबहों में घरों में काम करने वाली उसकी मां खांसते हुए बताती है कि साहब के घर पानी ही नहीं, हवा साफ करने की मशीन भी है।  काम तलाश रहे सुयश के पिता को यह तो मालूम है कि आने वाले दिनों में कोविड वैक्सीन लगे होने की शर्त पर काम मिलने की नौबत आ सकती है लेकिन यह नहीं मालूम कि वह अपने पूरे परिवार के लिए कोविड वैक्सीन खरीद भी पाएंगे या नहीं, कोविड के बाद की दुनिया में आपका स्वागत है।


✔️ 21वीं सदी का तीसरा दशक सबसे पेचीदा उलझन के साथ शुरू हो रहा है।  महामारी के बाद की इस दुनिया में तकनीकों की कोई कमी नहीं है, लेकिन बहुत बड़ी संख्या ऐसे लोगों की होगी जो जिंदगी बचाने या बेहतर बनाने की बुनियादी तकनीकों की कीमत नहीं चुका सकते।  जैसे कि भारत में करीब 80 फीसद छात्र लॉकडाउन के दौरान ऑनलाइन कक्षाओं में हिस्सा नहीं (ऑक्सफैम सर्वेक्षण) ले सके। 


✔️ फार्मास्यूटिकल उद्योग ने एक साल से भी कम समय में वैक्सीन बनाकर अपनी क्षमता साबित कर दी।  करोड़ों खुराकें बनने को तैयार हैं।  लेकिन बहुत मुमकिन है कि दुनिया की एक बड़ी आबादी शायद कोविड की वैक्सीन हासिल न कर पाए।  महंगी तकनीकों और उन्हें खरीदने की क्षमता को लेकर पहले से उलझन में फंसे चिकित्सा क्षेत्र के लिए वैक्सीन तकनीकी नहीं बल्कि आर्थिक-सामाजिक चुनौती है। 


✔️ भारत जैसे देशों में जहां सामान्य दवा की लागत भी गरीब कर देती हो वहां करोड़ों लोग वैक्सीन नहीं खरीद पाएंगे और कितनी सरकारें ऐसी होंगी जो बड़ी आबादी को मुफ्त या सस्ती वैक्सीन दे पाएंगी।


✔️ वैक्सीन बनाने वाली कंपनियां पेटेंट के नियमों पर अड़ी हैं, रियायत के लिए डब्ल्यूटीओ में भारत-दक्षिण अफ्रीका का प्रस्ताव गिर गया है।  कोवैक्स अलायंस और ऐस्ट्राजेनेका की वैक्सीन के सस्ते होने से उम्मीद है लेकिन प्रॉफिट वैक्सीन बनाम पीपल्स वैक्सीन का विवाद अभी सुलझा नहीं है। 


✔️ विकासशील देशों को सस्ती वैक्सीन मिलने की उम्मीद कम ही है।  सरकारें अगर लागत उठाने लगी तो बजट ध्वस्त, नया भारी कर्ज और नए टैक्स, ऊपर से अगर इन देशों को वैक्सीन देर से मिली तो अर्थव्यवस्थाओं के उबरने में समय लगेगा।


✔️ वैक्सीन का विज्ञान तो जीत गया लेकिन अर्थशास्त्र बुरी तरह फंस गया है।  आरोग्य सेतु ऐप की विफलता और लॉकडाउन के दौरान बढ़ी अशिक्षा के बीच करीबी रिश्ता है। भारत में अभी भी करीब 60 फीसद फोन स्मार्ट नहीं हैं यानी फीचर फोन हैं।  आरोग्य सेतु अपने तमाम विवादों के अलावा इसलिए भी नहीं चल सका कि शहर से गांव गए अधिकांश लोग के पास इस ऐप्लिकेशन को चलाने वाले फोन नहीं थे।


✔️ जिस ऑनलाइन शिक्षा को कोविड का वरदान कहा गया उसने 80 फीसद भारतीय छात्रों एक साल पीछे कर दिया, क्योंकि या तो उनके पास स्मार्ट फोन नहीं थे या इंटरनेट, ग्रामीण इलाकों में बमुश्किल 15 फीसद लोगों के पास ही नेट कनेक्टिविटी है। भारत की आधी आबादी के पास इंटरनेट की सुविधा नहीं है, और यदि उन्हें इंटरनेट मिल भी जाए तो केवल 20 फीसद लोग डिजिटल सेवाओं का इस्तेमाल (सांख्यिकी मंत्रालय) कर सकते हैं।


✔️ मुसीबत तकनीक की नहीं बल्कि उसे खरीदने की क्षमता है। इसलिए दुनिया के सबसे प्रदूषित शहरों में एक दिल्ली में अधिकांश आबादी उन लोगों की तुलना में पांच से दस साल कम (न्यूयार्क टाइम्स का अध्ययन) जिएंगे जिनके पास एयर प्यूरीफायर हैं। 


✔️ अंतराष्ट्रीय मुद्रा कोष आर्थिक बेहतरी मापने के लिए एक नए सूचकांक का इस्तेमाल कर रहा है जिसे वेलफेयर मेज़र इंडेक्स कहते हैं।  उपभोग, खपत, जीवन प्रत्याशा, मनोरंजन और खपत असमानता इसके आधार हैं।  2002 से 2019 के बीच भारत जैसे विकासशील देशों की वेलफेयर ग्रोथ करीब 6 फीसद रही है जो उनके प्रति व्यक्ति वास्तविक जीडीपी से 1.3 फीसद ज्यादा है यानी कि लोगों के जीवन स्तर में सुधार आया।


✔️ कोविड के बाद इस वेलफेयर ग्रोथ में 8 फीसद की गिरावट आएगी।  यानी जिंदगी बेहतर करने पर खर्च में कमी होगी।  चिकित्सा, शिक्षा, पर्यावरण, संचार में तकनीकों की कमी नहीं है लेकिन इन्हें सस्ता करने के लिए बड़ा बाजार चाहिए लेकिन आय कम होने और गरीबी बढ़ने से बाजार सिकुड़ रहा है इसलिए जिंदगी बचाने और बेहतर बनाने की सुविधा बहुतों को मिल नहीं पाएंगी।


✔️ यह नई असमानता की शुरुआत है की कमाई बढ़ी और रोजगार कम हुए बल्कि अप्रैल से जुलाई के बीच भारत के अरबपतियों की कमाई में 423 अरब डॉलर का इजाफा हो गया। 


✔️ तकनीकों की कमी नहीं है। अब, सरकार को लोगों की कमाई बढ़ाने के ग्लोबल प्रयास करने होंगे नहीं तो बहुत बड़ी आबादी आर्थिक असमानता की पीठ पर बैठकर तकनीकी असमानता की अंधी सुरंग में उतर जाएगी, जिसके बाद तेज ग्रोथ लंबे वक्त के लिए असंभव हो जाएगी

सुभाष चंद्र बोस- विलक्षण व्यक्तित्व के धनी और परोपकार की मूर्त


सुभाष चंद्र बोस- विलक्षण व्यक्तित्व के धनी और परोपकार की मूर्त



जानिए आज विशेष:- 

✔️ विलक्षण व्यक्तित्व के धनी सुभाष चंद्र बोस एक महान सेनापति, एक वीर सैनिक और राजनीति के अद्भुत खिलाड़ी तो थे ही, साथ ही वो दूसरों के दुख-दर्द को अपना दुख-दर्द समझने वाले संवेदनशील शख्स भी थे। उनसे जुड़े ऐसे ही कुछ दिलचस्प प्रसंग प्रस्तुत हैं, जिनसे उनकी उदारता, मित्रता, संवेदनशीलता, दूरदर्शिता स्पष्ट परिलक्षित होती है। 


✔️ जब वे स्कूल में पढ़ने जाया करते थे, तब उनके स्कूल के पास ही एक असहाय वृद्ध महिला रहती थी, जो अपने लिए भोजन बनाने में भी असमर्थ थी। सुभाष से उसका दुख देखा नहीं गया और प्रतिदिन स्कूल में वे लंच के लिए अपना जो टिफिन लेकर जाते थे, उसमें से आधा उन्होंने उस वृद्ध महिला को देना शुरू कर दिया। एक दिन उन्होंने देखा कि वह महिला बहुत बीमार है। करीब 10 दिनों तक उन्होंने उस वृद्ध महिला की सेवा कर उसे ठीक कर दिया।


✔️ सुभाष जब कॉलेज जाया करते थे, उन दिनों उनके घर के ही सामने एक वृद्ध भिखारिन रहती थी। पटे-पुराने चिथड़ों में भीख मांगते देख सुभाष का हृदय रोजाना यह सोचकर दहल उठता कि कैसे यह बुढ़िया सर्दी हो या बरसात अथवा तूफन या कड़कती धूप, खुले में बैठकर भीख मांगती है और फिर भी उसे दो जून की रोटी भी नसीब नहीं होती। यह सब देखकर उनका हृदय ग्लानि से भर उठता। घर से उनका कॉलेज करीब तीन किलोमीटर दूर था। आखिकार प्रतिदिन बस किराये और जेब खर्च के लिए उन्हें जो भी पैसे मिलते, उन्होंने वो बचाने शुरू कर दिए और पैदल ही कॉलेज जाना शुरू कर दिया। इस प्रकार प्रतिदिन अपनी बचत के पैसे उन्होंने जीवनयापन के लिए उस बूढ़ी भिखारिन को देने शुरू कर दिए। 


✔️ भारत की आजादी के संघर्ष में नेताजी सुभाष चंद्र बोस के नेतृत्व में आजाद हिन्द फैज' के योगदान को सदैव सराहा जाता है लेकिन एक बार उनकी इसी में एक साम्प्रदायिक विवाद ने जन्म ले लिया था। दरअसल मुस्लिम भाईयों का विरोध था कि मैस में सूअर का मांस नहीं बनेगा जबकि 'आजाद हिन्द पौज' के हिन्द साथी गाय का मांस इस्तेमाल करने का प्रखर विरोध कर रहे थे। विकट समस्या यह थी कि दोनों में से कोई भी पक्ष एक-दूसरे की बात मानने या समझने को तैयार नहीं था। विवाद बढ़ने पर जब यह सारा वाकया नेताजी के समक्ष आया तो उन्होंने सारे प्रकरण को गहराई से समझते हुए अगले दिन इस पर अपना फैसला सुनाने को कहा। चूंकि वे फ़ौज के सर्वेसर्वा थे तो स्पष्ट था कि उनका निर्णय ही अंतिम निर्णय होना था। अंततः दूरदर्शिता का परिचय देते हुए उन्होंने अगले दिन ऐसा निर्णय सुनाया कि हिन्दुओं तथा मुसलमानों के बीच पनपा विवाद स्वतः ही खत्म हो गया। अपने फैसले में उन्होंने कहा कि भविष्य में 'आजाद हिन्द फैज' की मैस में न तो गाय का मांस पकेगा, न ही सूअर का।


✔️ कॉलेज में सुभाष चंद्र बोस का एक दोस्त था, जो बंगाल की ही किसी छोटी जाति से संबंध रखता था। हॉस्टल में रहते हुए उसे एक बार चेचक हो गया। छूत की बीमारी होने के कारण उसके होस्टल के साथी उसे उसके हाल पर अकेला छोड़ गए लेकिन जब सुभाष को यह बात पता चली तो उनसे यह सब देखा नहीं गया। वे उसके पास पहुंचे और स्वयं उसका इलाज शुरू कराया और रोज उसे देखने जाने लगे। जब सुभाष के पिता को यह सब पता चला तो उन्होंने सुभाष को समझाया कि यह छूत की बीमारी है और तुम्हें भी लग सकती है, इसलिए उस लड़के से दूर रहा करो किन्तु सुभाष ने जवाब दिया कि उन्हें पता है कि यह छूत की बीमारी है किन्तु संकट की घड़ी में मित्र ही मित्र के काम आता है और अगर जरूरत पड़ने पर वह अपने निर्धन और बेसहारा मित्र की मदद नहीं करेंगे तो फिर कौन करेगा? बेटे से मित्रता की यह सुंदर परिभाषा सुन उनके पिता बड़े खुश हुए और सुभाष ने अपने दोस्त का चेचक का इलाज पूरा कराकर उसे स्वस्थ कर दिया। 


✔️ बात उन दिनों की है, जब बंगाल में भारी बाढ़ आई हुई थी और गांव के गांव बाढ़ के पानी में समा गए थे। समस्त जनजीवन अस्त-व्यस्त हो गया था। सुभाष तब कॉलेज में पढ़ते थे। उन्होंने अपने कुछ सहपाठियों के साथ मिलकर बाढ़ पीडितों के लिए राहत सामग्री इकट्ठा करने का निश्चय किया और जी-जान से बाढ़ पीड़ितों की मदद में जुट गए।

बढ़ता एनपीए और बैड बैंक की अवधारणा

 

बढ़ता एनपीए और बैड बैंक की अवधारणा



विशेष:-

✔️ वित्त वर्ष 2021-22 के लिए पेश किए गए बजट में बैंकिंग क्षेत्र को मजबत बनाने के लिए बैड बैंक बनाने की घोषणा की गई है। बैड बैंक जैसे निकाय का गठन समय की मांग है, क्योंकि कोरोना महामारी की वजह से आमजन और कारोबारियों की आय में भारी कमी आई है और इस वजह से वे कर्ज और ब्याज चकाने में असमर्थ हैं। इससे बैंकों की गैर निष्पादित परिसंपत्तियों (एनपीए) में भारी इजाफा होने का खतरा मंडरा रहा है। 


✔️ बैड बैंक बनाने के आलोक में सरकार परिसंपत्ति पुनर्गठन कंपनी (एआरसी) और परिसंपत्ति प्रबंधन कंपनी (एएमसी) का गठन करेगी। इन कंपनियों के गठन का उद्देश्य बड़े दबावग्रस्त ऋण खातों का समाधान निकालना है, जिन्होंने एक से से अधिक बैंकों से कर्ज ले रखे हैं। 


✔️ एआरसी दबावग्रस्त परिसंपत्तियों के समाधान के लिए काम करेगी, जबकि एएमसी दबावग्रस्त परिसंपत्तियों के मूल्यांकन, विपणन, परिसंपत्ति की वास्तविक मूल्य की वसूली आदि का काम करेगी। 


✔️ बैड बैंक में सरकार कोई निवेश नहीं करेगी और न ही इसमें सरकार की कोई हिस्सेदारी (शेयर होल्डिंग) होगी। बैड बैंक बाजार भाव पर बैंकों से उनका डूबा कर्ज खरीदेगा, जिससे अधिक एनपीए वाले बैकों की बैलेंस शीट अच्छी हो जाएगी और उन्हें अपने कारोबार के लिए पूंजी जुटाने में आसानी होगी।


✔️ बैड बैंक के कई मॉडल हो सकते हैं। सभी सरकारी बैंकों के लिए एक बड़ा बैड बैंक हो सकता है या फिर एक की जगह कई बैड बैंक बनाए जा सकते हैं। फिर भी, मौजूदा परिवेश में ऐसा लग रहा है कि यह बैंक 15:85 मॉडल पर काम करेगा और इसमें सभी बैंकों के एनपीए खातों को एक जगह लाया जाएगा। 


✔️ इस मॉडल के तहत बैड बैंक से एनपीए वाले बैंक पंद्रह फीसद नकदी के रूप में भुगतान हासिल करेंगे, जबकि पिच्यासी फीसद बैड बैंक को मिलेगा। इस बैंक में शुरूआत में दो से सवा दो लाख करोड़ रुपए तक की एनपीए राशि शामिल की जा सकती है। 


✔️ बैड बैंक की स्थापना दो से तीन महीने के भीतर किए जाने का अनुमान है। इस बैंक के अस्तित्व में आने पर बैंक गुणवत्तायुक्त परिसंपत्ति पर विशेष ध्यान दे पाएंगे, जिससे मानक खातों के एनपीए में तब्दील होने की संभावना कम हो जाएगी। 


✔️ बैलेंस शीट साफ-सुथरी होने से रेटिंग एजेंसियों, देसी व विदेशी निवेशकों, जमाकताओं आदि पर भी सकारात्मक प्रभाव पड़ेगा और बैंक अपने कारोबार को आगे बढ़ाने की दिशा में काम कर सकेंगे।


✔️ भारतीय रिजर्व बैंक के नियामकीय राहतों को वापस लेने के बाद महामारी के कारण बही-खातों में संपत्ति का मूल्य घट सकता है, जिसके कारण बैंकों को पूंजी की कमी का सामना करना पड़ सकता है। 


✔️ एक अनुमान के अनुसार बैंकों का सकल एनपीए सितंबर 2021 तक बढ़ कर साढ़े तेरह फीसद हो सकता है, जो एक साल पहले साढ़े सात फीसद था। सरकार का भी मानना है कि सर्वोच्च अदालत द्वारा कर्ज की अदायगी में दी गई राहत के मामले में फैसला सुनाने के बाद बैंकों के एनपीए खातों की संख्या बढ़ सकती है। एनपीए बढ़ने पर बैंकों को अपनी पूंजी के एक बड़े हिस्से का प्रावधान एनपीए की मद में करना होगा। इससे उनकी कर्ज देने की क्षमता में कमी आएगी और कारोबार व मुनाफे पर भी बुरा असर पड़ेगा। 


✔️ वैश्विक रेटिंग एजेंसी एसएंडपी की रिपोर्ट 'द स्टेट्स फ्रैक्चर्स इन इंडियन फाइनेंशियल इंस्टीट्यूशंस' के अनुसार भी आगामी बारह से अठारह महीनों में एनपीए बढ़ कर कुल कर्ज का दस से ग्यारह फीसद तक पहुंच सकता है, जबकि 30 जून 2020 को यह आठ फीसद था।


✔️ वित्त वर्ष 1996-97 में सूक्ष्म, लघु और मझौले (एमएसएमई) और बड़े उद्योगों को दिए गए कर्ज में एनपीए का प्रतिशत सोलह था। हालांकि, बाद में अर्थव्यवस्था में आई तेजी और सरकारी बैंकों द्वारा उठाए गए सुधारवादी कदमों से एनपीए घटा। 


✔️ वर्ष 2007 में एनपीए का स्तर घट कर 2.6 फीसद रह गया। पुनः वैश्विक स्तर पर आई वित्तीय संकट की वजह से एनपीए के स्तर में बढ़ोतरी हुई और 2017-18 तक एनपीए का स्तर बढ़ कर ग्यारह फीसद के स्तर पर पहुंच गया। 


✔️ हालांकि, सामान्य तौर पर हुई एनपीए की वसूली और ऋणशोधन अक्षमता एवं दिवालिया संहिता (आईबीसी) की मदद से हुई एनपीए की वसूली से वित्त वर्ष 2019-20 में एनपीए का स्तर घट कर साढ़े आठ फीसद के स्तर पर पहुंच गया। 


✔️ चालू वित्त वर्ष की दूसरी तिमाही में कर्ज पुनर्गठन और कर्जों की किस्त एवं ब्याज के भुगतान पर लगे रोक से बैंकों को एनपीए की मद में बड़ी राशि का प्रावधान करना पड़ा है। 


✔️ प्रमुख निजी बैंकों की सितंबर तिमाही के आय विश्लेषणों से पता चलता है कि समग्र आधार पर आकस्मिक प्रावधान, परिसंपत्ति गुणवत्ता में कमी की वजह से किए गए। कोरोना महामारी से बैंकों के परिचालन लाभ का लगभग सत्ताईस फीसद हिस्सा प्रभावित हुआ है।


✔️ रिजर्व बैंक की वित्तीय स्थिरता रिपोर्ट के मुताबिक सरकारी बैंकों की स्थिति निजी बैंकों से ज्यादा खराब हो सकती है। रिपोर्ट बताती है कि दबावग्रस्त परिसंपत्तियों की वजह से कमजोर बैंक मार्च, 2021 तक न्यूनतम पूंजी स्तर का पालन करने में चूक कर सकते हैं। 


✔️ इस रिपोर्ट के अनुसार तिरपन देशी-विदेशी बैंकों की पूंजी पर्याप्तता अनुपात कम होकर 14.1 फीसद रह सकता है, जो सितंबर 2019 में 14.9 फीसद था। निजी बैंक पूंजी बढ़ा चुके हैं या पूंजी बढ़ाने की दिशा में काम कर रहे हैं। 


✔️ कोरोना महामारी के कारण सरकार की वित्तीय स्थिति भी संतोषजनक नहीं है। ऐसी स्थिति में भी सरकार सरकारी बैंकों के पुनर्पूजीकरण की कोशिशें कर रही है। लेकिन सभी कमजोर बैंकों का पुनर्पूजीकरण करना लगभग नाममकिन है। ऐसे में जिन बैंकों को पूंजी नहीं मिलेगी, उनकी वित्तीय स्थिति का खराब होना लगभग तय है। 


✔️ इस रिपोर्ट में निजी बैंकों का एनपीए अनुपात 3.1 से 4.5 फीसद के बीच बढने का अनुमान जताया गया है। एनपीए की वसूली में तेजी लाने के लिए नेशनल कंपनी लॉ ट्रिब्यूनल (एनसीएलटी) ढांचे को और मजबूत करने और दबावग्रस्त परिसंपत्तियों के तेजी से समाधान के लिए ई-कोर्ट प्रणाली शुरू करने की घोषणा बजट में की गई है। इस नई संकल्पना की मदद से अदालत में चल रहे मुकदमों का जल्दी निपटारा किया जाएगा, जिससे बैंकों के एनपीए स्तर में कमी आएगी। 


✔️ एमएसएमई क्षेत्र के एनपीए की वसूली के लिए सरकार अलग ढांचा बनाएगी, क्योंकि 31 मार्च 2021 से एमएसएमई क्षेत्र के एनपीए के नए मामलों के एनसीएलटी में दर्ज करने पर लगी पाबंदी को हटाने का प्रस्ताव है। मौजूदा प्रावधान की वजह से एनपीए की वसूली में कमी आई है, लेकिन नए प्रस्ताव से इसमें तेजी आने की उम्मीद है।


✔️ अर्थव्यवस्था के विकास में मूल बाधा पूंजी की कमी है और बैड बैंक एनपीए खातों में से वसूली करके पूंजी की उपलब्धता को सुनिश्चित करने का काम करेंगे। पूंजी होने पर ही बैंक जरूरतमंदों को कर्ज दे सकते हैं। इसी वजह से बैड बैंक की जरूरत बैंकिंग क्षेत्र में लंबे समय से महसूस की जा रही थी। 


✔️ बैड बैंक के अस्तित्व में आने के बाद बैंक अपने कारोबार को बढ़ाने की तरफ ध्यान दे सकेंगे। साथ ही ग्राहक सेवा में भी सुधार कर सकेंगे, जिससे बैंकों के मुनाफे में वृद्धि तो होगी ही, उन पर ग्राहकों, निवेशकों और रेटिंग एजेंसियों का भरोसा भी बढ़ेगा।


AvdHesH MeEnA

अभ्यास दोस्ती-17: हिंद महासागर में भारत, श्रीलंका और मालदीव की 'त्रिशक्ति', जानिए मुख्य विशेषताएं

    अभ्यास दोस्ती-17: हिंद महासागर में भारत, श्रीलंका और मालदीव की 'त्रिशक्ति', जानिए मुख्य विशेषताएं हिंद महासागर में रणनीतिक सुरक्...